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पुस्तक लेखन में मौलिक और नया सोचें

पत्रकारिता विश्वविद्यालय में 'पुस्तक लेखन' विषय पर व्याख्यान एवं जनसंचार विभाग में पुस्तकालय का शुभारंभ

भोपाल, 12 अगस्त, 2016 : परीक्षा कक्ष में उत्तरपुस्तिका में एक वाक्य लिखना आसान है, लेकिन किताब में एक वाक्य बनाना बहुत कठिन काम है। वाक्य ऐसा बनाना चाहिए कि उसे बार-बार पढ़ा जाए। ऐसा वाक्य बनाने के लिए मौलिक और नया सोचने की आवश्यकता है। क्योंकि, समाज में उसी लेखक का सम्मान होता है, जो अपने पूर्वजों के लेखन को अपनी नई सोच से आगे बढ़ाता है। यह विचार प्रख्यात साहित्यकार विजय बहादुर सिंह ने व्यक्त किए। पुस्तकालय दिवस के अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से 'पुस्तक लेखन' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में श्री सिंह बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे। इस अवसर पर जनसंचार विभाग में 'डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम पुस्तकालय' का शुभारम्भ भी किया गया। कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि प्रख्यात उपन्यासकार इंदिरा दांगी थीं और अध्यक्षता कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने की।

      समालोचक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि लेखक बनने के लिए सबसे पहले भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है। यदि आप अर्थशास्त्र की किताब भी लिखना चाहते हैं तब उसमें भाषा का वह जादू होना चाहिए, जिससे वह पाठक को बांध ले। भाषा में ज्ञान भी हो और आपका अनुभव भी। लेखक की शैली रुचिकर होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अच्छा लेखक वह होता है, जिसमें जीवन जीने की लालसा हो। लेखक को हमेशा जिंदा बने रहना चाहिए। वहीं, एक लेखक की प्रतिभा की ताकत को बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रतिभा में वह क्षमता होती है, जिससे एक सच के मुकाबले दूसरा सच खड़ा किया जा सकता है और इस प्रक्रिया में प्रतिभा पहले सच को झूठा साबित भी कर सकती है।

      प्रतिभा, अध्ययन और अभ्यास से बनता है लेखक : संगोष्ठी की विशिष्ट अतिथि एवं युवा कथाकार इंदिरा दांगी ने कहा कि लिखने के लिए हमें उस विषय को चुनना चाहिए, जिसकी अनुमति हमारी आत्मा देती है और फिर उस विषय को पूरी तरह से जीना चाहिए। उन्होंने बताया कि अच्छा लेखक बनने के लिए तीन आवश्यकताएं हैं- प्रतिभा, अध्ययन और अभ्यास। सबसे पहले आपके भीतर लेखन की प्रतिभा होनी चाहिए। उसके बाद अच्छा लिखने के लिए अच्छा अध्ययन और अभ्यास आवश्यक है। उन्होंने बताया कि एक लेखक के निर्माण में पुस्तकालय का बहुत अधिक महत्त्व होता है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि साहित्य जीवन है, जीविका नहीं। आप लेखन में तब आईए, जब आप इसे अपना जीवन देना चाहते हैं।

      अनुभव बाँटने का सशक्त माध्यम है पुस्तक लेखन : कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि लेखक के लिए लिखना अनिवार्य है। लिखने के लिए सोचना अनिवार्य है। सोचने के लिए पढऩा अनिवार्य है। पढऩे और सोचने के बीच जो मंथन है, वह ही लिखने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सृष्टि में मनुष्य ही एकमात्र जीव है, जो अपने अनुभव बाँटता है। इसकी शुरुआत उसने गुफाओं में चित्र बनाकर की। आज के समय में वह विभिन्न माध्यमों के जरिए अपने अनुभव समाज के साथ साझा कर रहा है। पुस्तक लेखन भी अनुभव बाँटने का एक सशक्त माध्यम है। इसलिए जब हम पुस्तक लिखने का विचार करते हैं, तब हमें सोचना चाहिए कि क्या हमारे पास समाज से साझा करने के लिए कुछ है? प्रो. कुठियाला ने यह भी कहा कि यदि आपमें लिखने की कला है, लेकिन आप कुछ लिखते नहीं है, यह समाज के लिए घातक है। समाज के लिए उससे भी अधिक नुकसानदायक यह है कि आपमें लिखने की कला नहीं है, लेकिन फिर भी आप लिखते हैं। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सौरभ मालवीय ने किया और आभार प्रदर्शन जनसंचार विभागाध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।