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संस्कृत हो सकती है भारतीय भाषाओं में अंतर्संवाद का आधार : प्रो. कुठियाला

नई दिल्ली, 14 जनवरी, 2017 : अंग्रेजी को कोसने की बजाए हमें एक ऐसी भाषा को विकसित करना चाहिए जो पूरे भारत में मान्य हो। इसके लिए हमें विभिन्न भारतीय भाषाओं के साझे तत्वों को चिन्हित करते हुए एक सूत्र में पिरोना होगा। संस्कृत इसका आधार हो सकती है। उपरोक्त बातें माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहीं। वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संयुक्त तत्वाधान में भारतीय भाषाओं में अंतर्संवाद विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बतौर अध्यक्ष बोल रहे थे। प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेला के हॉल नंबर 12 में इस संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। इस दौरान विश्व विद्यालय द्वारा प्रकाशित प्रो. एम आर पात्रा की पुस्तक एडवर्टाइजिंग एंड मार्केटिंग कम्यूनिकेशन का लोकार्पण भी किया गया

वरिष्ठ पत्रकार एवं ख्यातिलब्ध सामाजिक कार्यकर्ता जे. नंदकुमार ने विषय पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच अंतर्संवाद को कायम करने हेतु प्रत्येक भारतीयों को संस्कृत सीखना चाहिए। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं में 60 फीसदी शब्द संस्कृत के है। व्याकरण, वाक्य निर्माण, उच्चारण इन सभी के लिए संस्कृत को आधार बनाने की आवश्यकता है। इतिहास की विभिन्न घटनाओं का उल्लेख करते हुए नंदकुमार ने कहा कि भारत की समृद्धि हेतु सभी भारतीय भाषाओं के बीच अंर्तसंवाद को कायम रखना होगा।

मराठी दैनिक सकाल के पुणे संस्करण के पूर्व संपादक आनंद अगासे ने कहा कि भारत अपनी एकता एवं विविधता के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। मगर दुर्भाग्य से देश में कुछ शक्तियां अपने हितों को लेकर भाषाई आधार पर लोगों को बांटने का काम कर रही हैं। जो देश की एकता और अखंडता के लिए गंभीर चुनौती है। विभिन्न राज्यों के भाषाई संस्थानों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि राज्यों की भाषाई संस्थान केवल विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध साम्रगियों  को अपने भाषा में अनुवाद करने का काम कर रही है। उन्होंने भारतीय भाषाओं में अंतर्संवाद पर बल देते हुए कहा कि विभिन्न भाषाओं का एक संयुक्त सम्मेलन नियमित अंतराल पर आयोजित किया जाना चाहिए ताकि भारतीय भाषाओं के विद्वान आपस में मंथन कर अंतर्संवाद बढ़ा सकें।

वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि अंग्रेजी, भारतीय भाषाओं के लिए चुनौती है। भारत आगे चलकर आर्थिक, सामाजिक व सामरिक दृष्टिकोण से सशक्त होगा मगर सांस्कृतिक रुप से भारत कमजोर होगा क्योंकि भाषाएं किसी भी संस्कृति की गर्भनाल हैं। भाषाई प्रदूषण से हमारी आत्मा भी प्रदूषित हो जाएगी। भाषाएं चेतना की वाहक होती हैं। मगर हम अपनी भाषाओं से जिस प्रकार दूर होते जा रहे हैं, ऐसे में आने वाली पीढ़ी के सामने भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखना एक गंभीर चुनौती होगी। इनके अलावा वरिष्ठ पत्रकार और एनबीटी के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम में डॉ. नंदकिशोर त्रिखा, प्रो बीएस निगम, श्री बीएस नागी, संजय द्विवेदी, उमेश चतुर्वेदी, श्रीमती मीता उज्जैन,  लालबहादुर ओझा, सूर्यप्रकाश के अतिरिक्त नोएडा परिसर के शिक्षक और विद्यार्थी भी मौजूद थे। संचालन डॉ. अरुण कुमार भगत ने और धन्यवाद ज्ञापन नोएडा परिसर की सह प्रभारी रजनी नागपाल ने किया।