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सिनेमा के सौंदर्यशास्त्र से जुड़ा है कला निर्देशन

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में 'फिल्म समालोचना कार्यशाला' का आयोजन

भोपाल, 18 नवम्बर, 2017: भारतीय सिनेमा का इतिहास श्वेत-श्याम फिल्म हरिशचंद्र से प्रारंभ होता है। तब से लेकर अब तक सिनेमा का लुक अपनी जरूरतों के हिसाब से बदलता रहा है। समय, कथानक, विचार और पैसे ने हिंदुस्तानी सिनेमा के कला रूप को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, कथानक। किसी भी फिल्म का लुक उसकी कहानी पर आधारित होता है। कला निर्देशन सिनेमा के सौंदर्यशास्त्र से जुड़ा है। यह विचार प्रख्यात कला निर्देशक जयंत देशमुख ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित 'फिल्म समालोचना कार्यशाला' में व्यक्त किए। कार्यशाला के अंत में उन्होंने प्रतिभागियों से सिनेमा जगत से संबंध में चर्चा की और उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने की।

                'सिनेमा एवं कला' विषय पर श्री देशमुख ने कहा कि सिनेमा के कला पक्ष को सीखना है तो जरूरी है कि हम रंगों के संयोजन को समझें। रंगों की भाषा को जानें। प्रत्येक रंग कुछ कहता है। किसी भी फिल्म के एक-एक दृश्य को प्रभावी बनाने में कला निर्देशक की महती भूमिका है। यदि फिल्म की कहानी वास्तविक है तब उसका कला पक्ष रीयलिस्टक होगा, जैसा कि बैंडेट क्वीन में दिखाई देता है। यदि कहानी कल्पना पर आधारित होगी, उसका कला पक्ष कल्पना पर आधारित होगा, जैसा कि हमें फिल्म गोलमाल में दिखाई देता है। उन्होंने बताया कि कला पक्ष फिल्म के निर्देशक, डिजाइनर, फोटो निर्देशक, डायरेक्टर ऑफ प्रोडक्शन और प्रोड्यूसर से जुड़ता है। प्रोडक्शन (डिजाइन) पूरी फिल्म को डिजाइन करते हैं और कला निर्देशक उसे क्रियान्वित करते हैं। श्री देशमुख ने बताया कि सिनेमा टेक्नीकल काम है। इसमें अभ्यास और अनुभव हमें बहुत कुछ सिखाता है। उन्होंने बताया कि हॉलीवुड और दूसरी फिल्मों के आने से भारतीय सिनेमा के कला पक्ष पर बहुत प्रभाव पड़ा है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि टेलीविजन के छोटे पर्दे ने भी सिनेमा के बड़े पर्दे पर असर डाला है। टेलीविजन का मानना है कि कला पक्ष ऐसा होना चाहिए कि समाज भी अपने घरों एवं जीवन में वैसा बदलाव लाने लगें। टेलीविजन में दिखाए जाने वाले घरों ने मध्यमवर्गीय परिवारों के घरों की सजावट को बदल दिया है। महिलाओं का मेकअप, जूलरी और पहनावा टेलीविजन के अनुसार बदल रहा है।

                कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि फिल्म जगत में अपने करियर की तैयारी करने वाले युवाओं को विचार करना चाहिए कि फिल्म उनके लिए क्या है और क्यों है? फिल्म जगत में काम करने से पहले उन्हें अपनी भूमिका तय कर लेनी चाहिए। स्वयं का मूल्यांकन कर उन्हें विचार करना चाहिए कि उन्हें अभिनय करना है, कैमरा करना है, कला निर्देशन करना है या फिर फिल्मों के लिए लिखना है। यदि वे समय रहते अपनी भूमिका चुन लेंगे, तो इस क्षेत्र में काम करने की अपार संभावनाएं हैं। कार्यशाला की प्रस्तावना कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा ने प्रस्तुत की और डीन अकादमिक प्रो. पवित्र श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

                'फिल्मों के लिए लेखन' विषय पर कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने बताया कि फिल्मों को समझने के लिए हमें जीवन की समग्र दृष्टि आत्मसात करनी चाहिए। जिज्ञासु मन लेकर हम सिनेमा को अच्छे से समझ सकते हैं। देशकाल और परिस्थितियों के हिसाब से सिनेमा रचा जाता है। इसलिए किसी कहानी की पृष्ठभूमि को समझने बिना हम फिल्मों के लिए अच्छा लेखन नहीं कर सकते। संगीत, कहानी, संवाद, रंग, दृश्य इत्यादि की बुनियादी समझ विकसित करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि किसी का साक्षात्कार लेते समय हमारे पास प्रश्न अच्छे होने चाहिए, तभी उत्तर अच्छे आएंगे। उत्तर तो संसार में पहले से उपस्थित हैं, प्रश्नों को ही उनके पास जाना पड़ता है। वहीं, प्रख्यात रंगकर्मी आलोक चटर्जी ने अनेक उदाहरणों से 'फिल्म अभिनय एवं निर्देशन' विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि सिनेमा के संबंध में इस बात को गाँठ बांधना जरूरी है कि फिल्म या ड्रामा हम दर्शकों के लिए बनाते हैं, अपने लिए नहीं। इसलिए दर्शक की अभिरुचि का ध्यान रखना जरूरी है। उन्होंने बताया कि कोई भी बड़ा अभिनेता एकदम से नहीं बनता। उसकी यात्रा में समय लगता है। अभिनय के लिए अनुशासन बहुत जरूरी है।

                'वृत्तचित्र निर्माण' विधा पर वरिष्ठ पत्रकार एवं वृत्तचित्र निर्माता अनिल यादव ने प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने लोहा पीटने वाले समुदाय पर बनाया गया वृत्तचित्र भी दिखाया। उन्होंने कहा कि देश में अनेक वर्ग एवं समुदाय ऐसे हैं, जो स्वयं की पहचान खोज रहे हैं। हमें ऐसे वर्गों को अपने वृत्तचित्र का विषय बनाना चाहिए। विश्वविद्यालय की पूर्व विद्यार्थी एवं मुम्बई में क्रिएटिव डायरेक्टर श्रुति श्रीवास्तव ने 'फिल्मों एवं धारावाहिकों में रचनात्मकता' विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि क्रिएटिव लेखन एवं डायरेक्शन के लिए शोध बहुत जरूरी है। फिल्म क्षेत्र में धीरज रखना बहुत जरूरी है। क्रिएटिव टीम को पटकथा पर बहुत ध्यान देना चाहिए। कार्यशाला में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई लघु फिल्मों एवं वृत्तचित्रों का प्रदर्शन भी किया गया, जिन्हें काफी सराहा गया।