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भारतीय ज्ञान-परंपरा पर विमर्श करने 'ज्ञान-संगम' में जुटेंगे शोधार्थी एवं विद्वान

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का आयोजन, 'भारतीय जीवन दृष्टि : वर्तमान संदर्भ में व्याख्या' पर केंद्रित शोधार्थियों का समागम 'ज्ञान संगम' 7-8 दिसंबर को भोपाल में

भोपाल, 02 दिसंबर, 2017: हजारों वर्ष पूर्व दक्षिण एशिया की भूमि पर पनपी सभ्यता ने मनुष्य के जीने की एक अनोखी शैली उन्नत की थी। आज अब विश्व में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण, आतंकवाद एवं सामाजिक विषमता के कारण मानव का अस्तित्व ही संकट में पड़ चुका है, तब पूरा विश्व समझने की कोशिश कर रहा है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति ने जीवन के क्या मूल्य स्थापित किए थे। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के तत्वावधान में भोपाल में 7-8 दिसम्बर, 2017 को आयोजित होने वाले 'ज्ञान-संगम' में भारतीय जीवन दृष्टि की वर्तमान व्याख्या पर मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के अध्यापक विमर्श करने वाले हैं। ज्ञान-संगम का उद्घाटन 7 दिसंबर को सुबह 11 बजे प्रशासनिक अकादमी के सभागार में होगा।

            कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने बताया कि विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों के अध्यापक अपने-अपने विषयों को लेकर भारतीय दृष्टिकोण पर व्यापक विमर्श करेंगे। व्यक्ति के जन्म से संस्कार, ज्ञान एवं विद्या उसके व्यक्तित्व का निर्माण करती है। उसमें परिवार एवं शिक्षण संस्थाओं की भूमिका मुख्य रहती है। इस विषय पर व्यापक विमर्श होगा। इसके साथ ही एक विषय यह भी रहेगा कि जीवन में सुख प्राप्ति के क्या साधन हैं? इसी प्रकार से एक सत्र में विद्वान चर्चा करेंगे कि मानव जीवन में संघर्ष अनिवार्य है या कि सामंजस्य और इस विषय में प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनियों ने किस प्रकार की व्यवस्था की है? वर्तमान की मानवता सूचना-प्रौद्योगिकी और मीडिया पर आधारित जीवन व्यतीत करती है, परंतु सामाजिक संवाद प्राचीन भारत में किन साधनों से होता था और उसके लिए हमारे ग्रंथों में सूचनाओं में किस प्रकार की आवश्यकताओं को प्रमुख माना गया है। एक सत्र में विमर्श होगा कि कला, मनोरंजन के लिए है या मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए। न्याय व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था एवं राज्य व्यवस्था की प्राचीन भारतीय दृष्टि की तुलना आज की व्यवस्थाओं से भी करने का उद्देश्य है। इसी प्रकार एक सत्र में इस विषय पर चर्चा होगी कि भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने प्रकृति के ज्ञान को किस प्रकार से समझा एवं प्रतिपादित किया अर्थात वर्तमान शोध की दृष्टि और प्राचीन ज्ञान निर्माण की दृष्टि में अंतर को समझने-समझाने का प्रयास किया जाएगा।

            इस विमर्श में राष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त प्रज्ञा प्रवाह एवं भारतीय शिक्षण मण्डल जैसी अनेक संस्थाओं का सहयोग रहेगा। विभिन्न विषयों को प्रतिपादित करने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वानों ने विश्वविद्यालय का निमंत्रण स्वीकार किया है। पद्मश्री डॉ. नरेन्द्र कोहली जीवन में सामंजस्य एवं समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डालेंगे और स्वामी धर्मबन्धु भारतीय सुख दृष्टि की व्याख्या करने वाले हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रो. दीनबंधु पाण्डेय कला एवं मनोरंजन की भारतीय दृष्टि का विश्लेषण करेंगे। प्रो. भगवती प्रसाद शर्मा प्रबंधन की प्राचीन व्यवस्थाओं एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री मनोज श्रीवास्तव प्राचीन भारत की आदर्श राज्य व्यवस्थाओं की प्रस्तुति करेंगे। दक्षिण भारत से पधारे आरूल मोदी प्राकृतिक चिकित्सा के आधार पर स्वस्थ्य जीवन बनाने की प्रक्रियाओं का वर्णन करने वाले हैं। इसके साथ ही सुश्री इंदुमति काटदरे, श्री कृष्ण गोपाल, डॉ. नागेंद्र, श्री जे. नंदकुमार, श्री मुकुल कानिटकर, श्री कपिल कपूर, श्री कृष्ण सेट्टी, श्री मनोज श्रीवास्तव एवं प्रो. शिवेंद्र कश्यप सहित अन्य विद्वान भी विभिन्न विषयों का प्रतिपादन करेंगे। ज्ञान-संगम में प्रतिभागियों से प्राप्त शोध-पत्रों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की भी व्यवस्था होगी।