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किसी में भेद नहीं मानती भारतीय जीवन दृष्टि : जे. नंदकुमार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित 'ज्ञान संगम' में 'भारतीय जीवन दृष्टि : वर्तमान संदर्भ में व्याख्या' पर चिंतन-मंथन प्रारंभ, आज प्रशासनिक अकादमी के स्वर्ण जयंती सभागार में सांयकाल 5:30 बजे होगा समापन

भोपाल 07 दिसंबर, 2017: भारतीय दृष्टि समूची सृष्टि को ईश्वर ही मानती है। मनुष्य मात्र में ही नहीं, अपितु प्रकृति के प्रत्येक तत्व- पेड़-पौधे, पक्षी, ग्रह-नक्षत्र, पृथ्वी, समुद्र एवं पहाड़, सबमें ईश्वर का ही अंश है। सबमें एक ही ब्रह्म है। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा में सबके साथ आत्मीय संबंध देखे गए हैं। अन्यत्र किसी विचार-संस्कृति में प्रकृति के प्रति ऐसा दृष्टिकोण नहीं है। यह विचार अखिल भारतीय प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक श्री जे. नंदकुमार ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित दो दिवसीय 'ज्ञान संगम' में व्यक्त किए। ज्ञान संगम का उद्घाटन प्रख्यात साहित्यकार पद्मश्री डॉ. नरेन्द्र कोहली, उच्च शिक्षा मंत्री श्री जयभान सिंह पवैया एवं कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने किया।

            'जीवन की भारतीय दृष्टि' विषय पर अपने उद्बोधन में श्री जे. नंदकुमार ने कहा कि हम अपने भीतर जिस प्रकाश को देखते हैं, दूसरे के भीतर भी उसी प्रकाश के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। भृतहरि ने अपने वैराग्य शतक में प्रकृति की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि आकाश मेरा भाई है। पृथ्वी मेरी माता है। वायु मेरे पिता हैं और अग्नि मेरा मित्र है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में प्रकृति को आनंद का बगीचा नहीं माना, बल्कि इसके साथ आत्मीय संबंध बनाए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन के आधार पर सभी विषयों के प्रति हमारी मौलिक मान्यताएं हैं। उन मौलिक मान्यताओं के आधार पर आज विमर्श करने की आवश्यकता है।

भारत भूमि पर विकसित सभी दर्शनों में सबके कल्याण का विचार : श्री नंदकुमार ने कहा कि भारत में विकसित वैदिक, जैन, सिख एवं बौद्ध सहित अन्य सभी दर्शन कहते हैं कि -'सबका कल्याण हो।' भारतीय परंपरा में ही सर्वे भवंतु सुखिन: का विचार किया गया है। भारतीय जीवन दृष्टि विभिन्न आधारों पर भेद करके विनाश की बात नहीं करती, बल्कि इसमें सबके कल्याण का विचार है। भारतीय दृष्टि ईश्वर के संबंध में कहती है कि किसी भी रूप में, किसी भी समय, किसी भी नाम से मुझे बुलाओ, मैं उसी रूप में आपके सामने आऊंगा। स्वामी विवेकानंद ने इसी बात को अपने शिकागो व्याख्यान में कहा था। भारत में सभी विषयों को देखने का एक सर्वसमावेशी दृष्टिकोण है। यह दर्शन है।

स्त्री-पुरुष की कल्पना अलग-अलग नहीं : श्री नंदकुमार ने कहा कि विश्व में भारतीय जीवन दृष्टि है, जहाँ स्त्री-पुरुष की रचना एवं कल्पना एकसाथ एक ही तत्व से मानी जाती है। यहाँ स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं माना गया है। दोनों को एक-दूसरे के समान एवं पूरक माना गया है। हमारे शक्ति के बिना शिव को शव मानते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन दृष्टि की वैचारिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक प्रासंगिकता बनी हुई है। विश्व शांति के लिए भारतीय दर्शन को जानना महत्वपूर्ण है।

जोडऩे वाला ऋषि और बांटने वाला राक्षस : ज्ञान संगम के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि एवं प्रख्यात साहित्यकार पद्मश्री डॉ. नरेन्द्र कोहली ने कहा ने हमारे इतिहास में दो शब्द आते हैं- ऋषि एवं राक्षस। जो लोगों को बांटने का काम करते हैं, वह राक्षस हैं। जबकि जो लोगों को जोड़ते हैं, उन्हें एकत्र लाते हैं, उन्हें ऋषि कहते हैं। ऋषि अपनी संस्कृति व राष्ट्र की रक्षा करता है। उन्होंने बताया कि ऋषि का अर्थ है बुद्धिजीवी। बुद्धिजीवी वह है, जो जानता है इसलिए मानता है और जिसे नहीं जानता, उसे जानने का प्रयास करता है। जबकि राक्षस वह है, जो जानता नहीं, इसलिए मानता नहीं और जानना भी नहीं चाहता। उन्होंने बताया कि जो लोग अपने सामथ्र्य का उपयोग लोगों का शोषण करने के लिए करते हैं, वह राक्षस हैं। आतंकवादियों ने सीरिया में महिलाओं के साथ जो किया गया, वैसा तो राक्षस नहीं कर पाएंगे। उन्होंने बताया कि दत्तात्रेय ने अवधूत गीता लिखी है। उसमें उन्होंने कहा है कि इस सृष्टि में कौन है, जिसकी मैं पूजा करूं। अपने इसी प्रश्न के उत्तर में दत्तात्रेय ने कहते हैं कि जिसकी मुझे पूजा करनी है, वह मैं ही तो हूँ। इस सृष्टि की रचना मैंने ही तो की है। पृथ्वी और सूर्य को मैंने ही तो बनाया है। दत्तात्रेय की यह बातें अनूठी लगती हैं। श्री कोहली ने बताया कि दत्तात्रेय जिस 'मैं' की बात कर रहे हैं, वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है, बल्कि 'आत्मा' है, जो सबके भीतर है। उन्होंने बताया कि जो आत्मा कामनाओं से बंधी रहती है, उसे मुक्ति नहीं मिलती है।

            डॉ. कोहली ने बताया कि भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु से पहले पश्चिम के विद्वान यह मानते ही नहीं थे कि वनस्पति में भी जीवन होता है। जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा में माना गया है कि जो कुछ भी इस सृष्टि में है, वह सब प्राणवान है। जिस प्रकार चैतन्य मनुष्य व्यवहार करता है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति के तत्व भी व्यवहार करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन दृष्टि में सबको समान माना गया है, जब तक कि वह धर्म की राह पर चले।

लोक मंगल की परंपरा है ज्ञान : उद्घाटन सत्र के विशिष्ट अतिथि एवं उच्च शिक्षा मंत्री श्री जयभान सिंह पवैया ने कहा कि सभ्यताएं युग के अनुसार बदलती रहती हैं किंतु संस्कृति कभी नहीं बदलती। संस्कृति का अर्थ है- जीवन मूल्य। ज्ञान-मंथन ज्ञानियों का संगम है, जिसमें अगला क्रम एक दूसरे में समाहित हो जाना है। हमारी भारतीय जीवन दृष्टि में ज्ञान संगम एवं मंथन विशिष्ट है। यह परंपरा महाकुम्भ से चली आ रही है। लोक मंगल की परंपरा ही ज्ञान है। उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानंद कहते थे कि-अतीत को पढ़ो, वर्तमान को गढ़ो और आगे बढ़ो। जो समाज अपने इतिहास एवं वांग्मय की मूल्यवान चीजों को नष्ट कर देता है, वह निष्प्राण हो जाते हैं और यह भी सत्य है कि जो समाज इतिहास में ही डूबे रहते हैं, वह भी निष्प्राण हो जाते हैं। श्री पवैया ने कहा कि पिछले हजार वर्ष के कालखण्ड में यह अभिशाप मिला है कि हमारे समाज में भिक्षु स्वभाव उत्पन्न हो गया है। स्वतंत्रता के बाद भी यह स्वभाव बढ़ता गया है। मानसिक दासता के कारण ही हम मानते हैं कि आधुनिक सब श्रेष्ठ है और प्राचीन सब बेकार। उन्होंने बताया कि आज के युग में तर्क और तथ्य के बिना किसी भी बात को सिर्फ आस्था के नाम पर आज की पीढ़ी के गले नहीं उतारा जा सकता। भारतीय ज्ञान को तर्क के साथ प्रस्तुत किया तो योग को पूरी दुनिया ने स्वीकार कर लिया है।

            इस अवसर पर उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि भारतीय ज्ञान-दर्शन के प्रति दुनिया में जिज्ञासा बढ़ रही है। यूरोप के लगभग प्रत्येक विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान का अध्ययन किया जा रहा है। भारतीय ज्ञान का अध्ययन करते समय यूरोप के विद्वानों का दृष्टिकोण यूरोपीय ही होगा, इसलिए भारतीय ज्ञान अपने मूल रूप में सामने आएगा, इसकी संभावना अधिक नहीं है। ऐसे में हमारे सामने चुनौती है कि हम अपने ज्ञान को भारतीय दृष्टिकोण से दुनिया के सामने लाएं। अपने विषय के क्षेत्र में भारतीय दृष्टि से शोध एवं अध्यापन कराएं और उसे पाठ्यक्रम में शामिल कराने के प्रयत्न करें।

इन विषयों पर भी हुआ विमर्श : ज्ञान संगम में पहले दिन 'ज्ञान, संस्कार, विद्या की भारतीय दृष्टि' पर पुनरुत्थान विद्यापीठ की कुलपति सुश्री इंदुमति काटदरे ने कहा कि भारत की सारी रचनाएं एवं विमर्श सत्य और धर्म के आधार पर है। उन्होंने संस्कृति और समृद्धि को श्रेष्ठ समाज का लक्षण बताया। उन्होंने कहा कि जो समाज संस्कृति एवं समृद्धि में सांमजस्य बनाकर चलता है, वह श्रेष्ठ है। इसी सत्र में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष श्री बल्देव भाई शर्मा ने कहा कि ज्ञान में जब संस्कार की युति होती है, तो वह विद्या बन जाती है। उन्होंने कहा कि ज्ञान शरीर है और संस्कार आत्मा। इनकी युति से विद्या का जन्म होता है, जो विश्व कल्याण की राह दिखाती है। वैदिक मिशन ट्रस्ट, राजकोट के प्रमुख स्वामी धर्मबंधु ने 'सुख एवं आनंद की भारतीय दृष्टि' विषय पर कहा कि भारतीय जीवन का मूल आधार जीवन को सुखी बनाना है। स्वतंत्रता से बड़ा कोई सुख नहीं है और परतंत्रता से बड़ा कोई दुख नहीं है। सुख एवं आनंद की भारतीय दृष्टि के अनुसार जहाँ ईश्वर का निवास होता है, वहाँ खुशहाली होती है। सुख एवं शान्ति बाजार में नहीं मिलेगी, बल्कि अपने कर्म को अच्छी तरह से करने के उपरांत ही सुख एवं आनंद की अनुभूति होती है। इसी विषय पर श्री जितेन्द्र बजाज ने गुरुवाणी, तैत्रीय उपनिषद एवं दैशिक शास्त्र के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए सुख और आनंद की भारतीय दृष्टि पर प्रकाश डाला। 'भारतीय जीवन में विज्ञान' विषय पर विचार रखते हुए राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुनील कुमार ने कहा कि ब्रह्माण की उत्पत्ति का भारतीय दर्शन हमें गीता में देखने को मिलता है जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराते हैं। उन्होंने कहा कि सही मायनों में गीता हमें भारतीय जीवन की दृष्टि सिखाती है। इसीलिए गीता को विज्ञान के साथ जोड़ा जाता है। उन्होंने भारतीय योग, पूजा पद्धति, विवाह संस्कार एवं अंतिम संस्कार को भी भारतीय विज्ञान के स्वरूप में बताते हुए अपने विचार प्रकट किए। इसी सत्र में जीबी पंत कृषि एवं तकनीकी विश्वविद्यालय, पंत नगर के प्रो. शिवेन्द्र कश्यप ने कहा कि संस्कृतियों को विकास जिज्ञासा प्रकट करने से होता है और जिज्ञासा ही विज्ञान को जन्म देती है। वहीं, भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री मुकुल कानिटकर ने 'नवीन ज्ञान रचना के लिए भारतीय दृष्टि' विषय पर कहा कि स्वतंत्रता के पश्चात ही हमारा तंत्र पश्चिमी ढांचे पर चल रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारी शिक्षा पद्धति भारतीय न होकर पश्चिमी है। उन्होंने कहा कि आज भी भारतीय जीवन दृष्टि उतनी ही जीवंत है, जितनी हजारों वर्ष पूर्व थी। नवीन ज्ञान रचना की भारतीय दृष्टि युगानुकूल होनी चाहिए। इसे भूतकालिक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। इस सत्र की अध्यक्षता श्री नवीन चंद्रा ने की और अपने विचार व्यक्त किए।

आज इन विषयों पर होगा विमर्श :

ज्ञान संगम में दूसरे दिन 8 दिसंबर को 'सामाजिक संवाद की भारतीय दृष्टि (संवाद का स्वराज)' विषय पर मुख्य प्रस्तुति कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला देंगे। इस सत्र में विशिष्ट अतिथि पत्रकार श्री उमेश उपाध्याय होंगे और अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री कैलाश चंद पंत करेंगे। इसके बाद 'कला एवं मनोरंजन की भारतीय दृष्टि' विषय पर प्रो. दीनबंधु पाण्डेय मुख्य वक्तव्य देंगे और अध्यक्षता प्रख्यात उपन्यासकार डॉ. नरेन्द्र कोहली करेंगे। वहीं, 'प्रकृति में सामंजस्य और समन्वयक की भारतीय दृष्टि' विषय पर मुख्य प्रस्तुति प्रो. भगवती प्रसाद शर्मा देंगे और सत्र की अध्यक्षता विचारक एवं चिंतक डॉ. कृष्ण गोपाल करेंगे। इसके साथ ही विभिन्न व्यवसायों में भारतीयता विषय के अंतर्गत स्वस्थ जीवन पर श्री अरुल मोली, धन संपदा के संग्रहण पर श्री बलतेज सिंह मान और राज्य व्यवस्था पर साहित्यकार श्री मनोज श्रीवास्तव मुख्य प्रस्तुति देंगे। इस सत्र की अध्यक्षता अखिल भारतीय साहित्यक परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री श्रीधर पराड़कर करेंगे। कार्यक्रम की सहयोगी संस्थाएं बौद्धिक एवं शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय प्रज्ञा प्रवाह एवं भारतीय शिक्षण मंडल हैं।

            कार्यक्रम का समापन 8 दिसंबर को सांयकाल 5:30 बजे प्रशासनिक अकादमी के स्वर्ण जयंती सभागार में ही होगा। समापन सत्र में मुख्य वक्ता प्रख्यात चिंतक एवं विचारक डॉ. कृष्ण गोपाल और विशिष्ट अतिथि जनसंपर्क एवं जलसंसाधन मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा होंगे।