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सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच खड़ा है सोशल मीडिया

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में 'सोशल मीडिया : आज का यथार्थ और भविष्य की आहटें' विषय पर संविमर्श का आयोजन

भोपाल, 20 मई, 2017: सोशल मीडिया के कारण यह एक पुनर्जागरण का समय है। हमें इससे जुडऩा पड़ेगा। सोशल मीडिया ऐसा माध्यम है, जिसका सदुपयोग भी किया जा सकता है और दुरुपयोग भी। आज सोशल मीडिया नकारात्मकता और सकारात्मकता के बीच खड़ा है। आवश्यकता है कि हम इन दोनों के बीच अपने विवेक को खड़ा करें। यह विचार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पुरुषोत्तम दुबे ने 'सोशल मीडिया : आज का यथार्थ और भविष्य की आहटें' विषय पर आयोजित संविमर्श में व्यक्त किए। संविमर्श का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति, इंदौर के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। 

            वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पुरुषोत्तम दुबे ने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से हम अपने विचारों को अभिव्यक्त कर सकते हैं। उन्हें पुष्ट और दृढ़ कर सकते हैं। अपनी कलाओं को व्यक्त कर अपनी प्रतिभा से सबको परिचित करा सकते हैं। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाना उचित नहीं है। हमें अपने विचार प्रकट करते समय अपशब्द और अमर्यादित भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया का उपयोग आगे बढऩे के लिए किया जाना चाहिए।

युवाओं के लिए बेहतर विकल्प : मुख्य अतिथि एवं वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रो. सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने बताया कि आज युवा लेखकों के लिए समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में रचनात्मक लेखन के लिए स्थान नहीं है। ऐसे में युवाओं के सामने सोशल मीडिया बेहतर विकल्प की तरह आया है। प्रो. चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया के खतरों के प्रति ध्यान दिलाते हुए कहा कि युवाओं को इंटरनेट पर बहुत अधिक आश्रित नहीं रहना चाहिए। गूगल पर जानकारी तो मिल सकती है, लेकिन ज्ञान नहीं। गूगल ने हमें आलसी बना दिया है। अच्छा लिखने के लिए गूगल की जगह, किताबों को स्रोत बनाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण हमें लिखने की जो आजादी मिली है, उसके खतरे भी हैं। लिखने की आजादी की भी एक सीमा तय होनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि लिखते समय हम स्वविवेक और आत्मसंयम का ध्यान रखें।

2040 तक सब डिजिटल : विश्वविद्यालय के नवीन मीडिया तकनीकी विभाग की अध्यक्ष डॉ. पी. शशिकला ने कहा कि भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। इंटरनेट क्रांति के कारण दुनिया में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। वर्ष 1990 में जब कुछ ही कम्प्युटर इंटरनेट के माध्यम से आपस में जुड़े थे, आज करोड़ों कम्प्युटर वर्ल्ड वाइड वेब के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2040 में कम्प्युटर और मोबाइल ही नहीं, बल्कि हमारा घर, कार और दूसरे अन्य गैजेट भी आपस में जुड़े होंगे। डॉ. शशिकला ने बताया कि लगभग 3000 साल पहले एक तमिल कवि ने अपनी कविता में कहा था कि हम सब एक ही दुनिया के नागरिक हैं और आपस में एक-दूसरे से जुड़े हैं। आज का सोशल मीडिया इसी अवधारणा पर आधारित है।

आपस में प्रवृत्ति का विस्तार है सोशल मीडिया : कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि प्रकृति का नियम है परिवर्तन और मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह इस परिवर्तन को स्वीकार करता है और उसे नकारता भी है। भगवान ने जब मनुष्य को बनाया, तब उन्होंने उसे मस्तिष्क भी दिया। मनुष्य ने विचार किया कि उसे जो अंग दिए गए हैं,, उसकी सीमाएं हैं। अपने अंगों की कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए ही मनुष्य ने अपने मस्तिष्का उपयोग करते हुए पहिया, औजार, मशीन, कैमरा, माइक, स्पीकर और कम्प्युटर आदि का आविष्कार किया। उन्होंने बताया कि आपस में बात करने की प्रवृत्ति का विस्तार ही सोशल मीडिया है। सोशम मीडिया में जो संवाद है, उसका स्वरूप वैसा ही है, जैसा हमारे आम जीवन और साहित्य में है। यह समाज को तय करना चाहिए कि सोशल मीडिया में किस प्रकार के संवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और उसकी सीमाएं क्या होनी चाहिए। उद्बोधन से पूर्व कार्यक्रम में श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति, इंदौर की ओर से प्रतिवर्ष प्रकाशित किए जाने वाले कैलेण्डर का विमोचन किया गया। इस अवसर पर संस्था के कार्य और प्रतिष्ठित पत्रिका वीणा का परिचय संपादक राकेश शर्मा ने दिया। धन्यवाद ज्ञापन विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा ने व्यक्त किया। संविमर्श में एक खुले सत्र का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन डॉ. पवन मालिक ने किया।