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मीडिया, पुलिस दोनों समाज के लिए – श्रीमती सिंह

सत्रारंभ समारोह में पुलिस और मीडिया विषयक सत्र में हुई चर्चा 

भोपाल, 29 जुलाई, 2017: राष्‍ट्रपति पदक से सम्‍मानित वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी श्रीमती अनुराधा शंकर सिंह ने कहा कि मीडिया और पुलिस दोनों में बहुत समानता है। मीडिया समाज का विभाग है, वहीं पुलिस जनता के द्वारा चुनी गई सरकार का एक विभाग है। दोनों का काम समाज को दिशा देने का है, लेकिन जब पुलिस और मीडिया के अहंकार आपस में टकराते हैं तो फिर परेशानियां होती हैं।

श्रीमती सिंह ने यह विचार माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय द्वारा आयोजित सत्रारंभ समारोह के अंतिम दिन पुलिस और मीडिया विषय पर आयोजित सत्र में व्‍यक्‍त किए। उन्‍होंने बताया कि मीडिया और पुलिस दोनों को एक-दूसरे की जरूरत होती है। मीडिया को पुलिस से अपराध से जुड़ी खबरें चाहिए, वहीं पुलिस के लिए मीडिया एक बड़ा स्रोत होता है क्‍योंकि पत्रकार सब जगह आ-जा सकते हैं। कई बार व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ के कारण दोनों के रिश्‍ते बिगड़ जाते हैं, लेकिन दोनों को एक-दूसरे के काम और सीमाएं मालूम होना चाहिए।

उन्‍होंने मीडिया के विद्यार्थियों से कहा कि उन्‍हें कानून का सामान्‍य ज्ञान होना चाहिए और पुलिस के अधिकारों से भी परिचित होना चाहिए। विद्यार्थियों के सवालों का जवाब देते हुए उन्‍होंने बताया यह दुर्भाग्‍य है कि हमारे देश में आज भी अंग्रेजों के द्वारा बनाया गया पुलिस एक्‍ट प्रचलन में है, यह उपनिवेशवादी है और स्‍वतंत्रता संग्राम के समय जनता को नियंत्रण में करने के लिए इसे बनाया गया था। उच्‍चतम न्‍यायालय ने 11 साल पहले मॉडल पुलिस एक्‍ट दिया और उसे सभी राज्‍य सरकारों से लागू करने के लिए कहा। राजस्‍थान और हरियाणा में यह एक्‍ट लागू हो चुका है, कई राज्‍यों में अभी नया पुलिस एक्‍ट बनना बाकी है। उन्‍होंने बताया कि यह एक गलत धारणा है कि पुलिस और जनता के बीच सम्‍बन्‍ध अच्‍छे नहीं हैं। पुलिस स्‍टेशन ही एकमात्र ऐसा सरकारी कार्यालय है जो चौबीस घंटे खुला रहता है। उन्‍होंने कहा कि यह सही है कि पुलिस का व्‍यवहार ठीक नहीं होता, उसका कारण विभाग की सामन्‍ती व्‍यवस्‍था है।

सत्र की अध्‍यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि परिवर्तित वातावरण में मीडिया और पुलिस के बीच संवाद बना रहना चाहिए क्‍योंकि यह समाज के हित में हैं। कार्यक्रम का संचालन संचार शोध विभाग की अध्‍यक्ष डॉ. मोनिका वर्मा ने किया। न्‍यू मीडिया टेक्‍नॉलॉजी विभाग की अध्‍यक्ष डॉ. पी. शशिकला ने श्रीमती सिंह का सम्‍मान किया।

भारतीय युवाओं के पास हैं आज ज्‍यादा अवसर - प्रो. कुठियाला

समारोह के अंतिम सत्र को सम्‍बोधित करते हुए कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि आज भारत की वर्तमान पीढ़ी के पास विश्‍व के अन्‍य युवाओं की तुलना में बहुत अवसर हैं। उन्‍होंने ऐसे समय में जन्‍म लिया है जब पूरा विश्‍व भारत की ओर आशाभरी नजरों से देख रहा है और युवाओं के पास ऐसी तकनीक उपलब्‍ध है जिससे पूरे विश्‍व में संचार किया जा सकता है। इसके अलावा प्राचीन समृद्ध विरासत है जो अपने आप में सौभाग्‍य है। सात हजार वर्ष पूर्व इसी धरती पर रहने वाले लोग प्रकृति के रहस्‍य जानते थे और उसके अनुसार जीवन जीते थे। अमेरिका और रूस के वैज्ञानिकों ने भी कहा है कि सात हजार वर्ष पूर्व वैदिक सभ्‍यता मौजूद थी। आज अमेरिका में भारतीय सभ्‍यता और संस्‍कृति को पढ़ाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर विभाग खोले जा रहे हैं। प्रो. कुठियाला ने विद्यार्थियों से आव्‍हान किया कि वे खूब पढ़ें, चिंतन करें और फिर लिखें। साथ ही अलग-अलग विषयों पर अलग-अलग लोगों से सलाह मश्‍वरा करना चाहिए।

मंच पर विश्‍वविद्यालय के कुलाधिसचिव श्री लाजपत आहूजा एवं कुलसचिव श्री दीपक शर्मा जी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन समारोह के संयोजक श्री संजय द्विवेदी ने किया।

डिजिटल संसार में फर्जी खबर सबसे बड़ी समस्‍या- श्री खरे

वरिष्‍ठ पत्रकार श्री अनुज खरे ने कहा कि बड़ी संख्‍या में डिजिटल संसार  में आई फर्जी खबर मीडिया का हिस्‍सा बन रही है। भारत में जो डेटा उपभोग बढ़ा है, उसमें 70 फीसदी हिस्‍सा संदेशों और वीडियो के कारण है ।

सत्रारंभ समारोह के अंतिम दिन 'डिजिटल मीडिया और युवा' विषय पर आयोजित सत्र को सम्‍बोधित करते हुए श्री खरे ने कहा कि आने वाले समय में फर्जी खबर सबसे बड़ी समस्‍या होगी,क्‍योंकि लोग स्रोत और सत्‍य को जाने बगैर संदेश को आगे बढ़ा देते हैं। उन्‍होंने कहा कि अमेरिका में राष्‍ट्रपति के चुनाव के दौरान सोशल मीडिया पर वायरल हुए संदेशों का अध्‍ययन किया गया उसमें यह पाया गया कि फर्जी खबर को लगभग 90 लाख प्रतिक्रियाएं और पसंद, नापसंद मिली, जबकि अमेरिका के ही 19विश्‍वसनीय वेबसाइट पर जारी संदेशों को 70 लाख प्रतिक्रियाएं मिलीं। इससे अंदाजा  लगाया जा सकता है कि फर्जी खबर किस तरह से आगे बढ़ती है। उन्‍होंने बहुत सारे उदाहरण देते हुए विद्यार्थियों को समझाया कि डिजिटल संसार में फर्जी कंटेंट और संदेशों को सॉफ्टवेयर की मदद से चेक किया जा सकता है।सिंगापुर, केलिफोर्निया जैसे राज्‍यों में इसके लिए कानून भी बनाए हैं। जर्मनी में भी इस बारे में भी कानून बनाया जा रहा है।

जी.डिजिटल के सम्‍पादक श्री दयाशंकर मिश्र ने कहा कि डिजिटल मीडिया में काम करने के लिए गंभीर बनना पड़ेगा और अन्‍य सब माध्‍यमों से सामंजस्‍य करना होगा। भारत में अभी समाचार पत्र का भविष्‍य उज्‍ज्‍वल है, आने वाले समय में सभी के लिए एक माध्‍यम हो जाएगा। सत्र का संचालन कम्‍प्‍यूटर विभाग की सह प्राध्‍यापक डॉ. सुनीता द्विवेदी ने किया।

माध्‍यम नहीं विचार है कालजयी - 'न्‍यू मीडिया में केरियर' विषय पर सत्र सम्‍पन्‍न

वैब दुनिया के रीडर, सम्‍पादक श्री जयदीप कार्णिक ने कहा कि सभी तरह के मीडिया में पत्रकारिता, प्राण और आत्‍मा है। माध्‍यम पुराने हो जाते हैं, लेकिन विचार हमेशा बने रहते हैं और वे ही कालजयी हैं। इसलिए पत्रकारिता में आने वाले विद्यार्थियों को विचारों पर काम करना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि कबीर के दोहे, गालिब के शेर, गुलजार के गीत और महात्‍मा गांधी के विचार समाचार पत्रों के साथ साथ न्‍यू मीडिया के कंटेंट का भी हिस्‍सा हैं। सत्रारंभ समारोह में 'न्‍यू मीडिया में केरियर' विषय पर हुए सत्र में उन्‍होंने कहा कि फेसबुक, गूगल जैसी बड़ी कंपनियों के कारण वेबसाइट्स और न्‍यूज पोर्टल को पर्याप्‍त राजस्‍व प्राप्‍त नहीं हो रहा है, जबकि दोनों बड़ी कंपनियां अरबों कमा रही हैं। उन्‍होंने कहा कि परम्‍परागत मीडिया के राजस्‍व से जुड़ी विज्ञापन एजेंसियां और मीडिया हाउसेस नहीं चाहते हैं कि सोशल मीडिया को विज्ञापन मिले।सत्र का संचालन सहायक प्राध्‍यापक, श्री सुरेन्‍द्र पॉल ने किया।

यूनिवर्सल डिजाईन के लिए पाठक को चुनने का अधिकार देना चाहिए 

मुम्‍बई के प्रो. पी. जे. मैथ्‍यु मार्टिन ने कहा कि न्‍यू मीडिया में विजुअल और दृश्‍य-श्रृव्‍य कंटेंट को सभी वर्ग के हिसाब से बनाया जाना चाहिए। ‘यूनिवर्सल डिजाईन इन न्‍यू मीडिया और कम्‍प्‍यूटर’ विषय पर आयोजित सत्र में उन्‍होंने कहा कि मीडिया में आने वाला कंटेंट में उपशीर्षक और कैप्‍शन होना चाहिए ताकि जो लोग सुन और देख नहीं सकते, वे भी उसका लाभ ले सकें। उन्‍होंने कहा कि सहज, सुलभ होना चाहिए। और इस क्षेत्र में रोजगार के भी अच्‍छे अवसर विद्यमान हैं। इस बारे में देश में कानून भी बन चुके हैं। सत्र का संचालन डॉ. पी. शशिकला ने किया।