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देश की आत्मा है संस्कृत

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में
'आधुनिक समय में संस्कृत का महत्त्व' विषय पर संगोष्ठी

भोपाल, 04 अगस्त, 2017: दुनिया में जितने भी सशक्त और विकसित देश हैं, उन्होंने अपनी भाषा को नहीं छोड़ा है। उनके विकास का सबसे बड़ा कारण ही भाषा है। भाषा सिर्फ शब्द भंडार और व्याकरण मात्र नहीं होती है। हम भाषा विज्ञान की उस परंपरा से आते हैं, जिसमें शब्द को ब्रह्म माना जाता है। संस्कृत देश की आत्मा है। यदि संस्कृत को खत्म कर दिया जाए तो भारत की प्राय: सभी भाषाएं समाप्त हो जाएंगी। भारतीय भाषाओं के जीवन के लिए संस्कृत की आवश्यकता है। यह विचार संस्कृत के विद्वान डॉ. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय ने व्यक्त किए। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित 'आधुनिक समय में संस्कृत का महत्त्व' विषय पर विद्यार्थियों को संबोधित किया।

            डॉ. पाण्डेय ने कहा कि अभी 'ध्वनि विज्ञान' पर शोध आया है, जिसमें दुनिया के विद्वानों ने माना है कि ध्वनि की दृष्टि से संस्कृत सबसे अधिक वैज्ञानिक भाषा है। उन्होंने बताया कि हमें यदि भारत का मूल देखना है तब हम कहाँ जाएंगे? भारत को समझने के लिए संस्कृत के अलावा कोई अन्य माध्यम नहीं है। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि वह पेड़ ही आसमान को छूता है, जिसकी जड़ें गहरी और मजबूत होती हैं। यही नियम मनुष्य, परिवार, समाज और देश पर लागू होता है। उन्होंने बताया कि 'संस्कृत' शब्द हमें जीवन की शिक्षा देता है। संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा ने कहा कि भले ही हमारे यहाँ संस्कृत की उपेक्षा की जा रही है, लेकिन दुनिया संस्कृत सीखने का प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि ग्रामोफोन पर जब पहली बार रिकॉर्डिंग हुई तब प्रो. मैक्समूलर ने ऋग्वेद के पहले श्लोक को रिकॉर्ड कराया था। कार्यक्रम का संचालन नवीन मीडिया प्रौद्योगिकी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. पवन मलिक ने किया और धन्यवाद ज्ञापन कुलसचिव दीपक शर्मा ने किया।