MC University

  About University
icon About University
icon From VC's Desk
  Governing Bodies
icon Management Council
   
 

बच्चों की सुरक्षा के प्रति होना होगा सजग

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में
'बाल संरक्षण' विषय पर संगोष्ठी

भोपाल, 05 अगस्त, 2017: बेहतर समाज के निर्माण के लिए बाल संरक्षण की दिशा में गंभीरता से काम करने की जरूरत है। संचार और संवाद से जुड़े लोगों को बच्चों से जुड़े मामलों को प्रमुखता से समाज के सामने रखना चाहिए। परंतु, चिंता की बात है कि देश-दुनिया में बाल संरक्षण पर चिंतन तो हो रहा है, लेकिन बच्चों की परिभाषा को लेकर ही स्पष्टता और एकरूपता नहीं है। बच्चा किसे माना जाए, इस बात पर अलग-अलग राय हैं। दुनिया के सबसे युवा देश भारत में बच्चों की स्थिति चिंतित करने वाली है। राज्यसभा में प्रस्तुत एक आंकड़े के अनुसार पिछले वर्ष एक लाख से अधिक बच्चे गुम हुए। भारत में प्रतिदिन 250 से अधिक बच्चे गुम हो रहे हैं। यह विचार बाल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत दुबे ने व्यक्त किए। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग की ओर से आयोजित सार्थक शनिवार के अंतर्गत 'बाल संरक्षण' विषय पर विद्यार्थियों को संबोधित किया।

            आवाज संस्था के संस्थापक प्रशांत दुबे ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने 20 नवम्बर, 1989 को 'बाल अधिकार समझौता' पारित किया था। यह ऐसा पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो सभी बच्चों के नागरिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों को मान्यता देता है। इस समझौते पर दुनिया के 193 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। केवल दो राष्ट्रों अमेरिका और सोमालिया ने अब तक इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। उन्होंने बताया कि बाल अधिकार चार मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनमें जीने का अधिकार,  सुरक्षा का अधिकार, विकास और सहभागिता का अधिकार शामिल है। बच्चों की सुरक्षा को लेकर हम कितने लापरवाह हैं इस संबंध में उन्होंने बताया कि ज्यादातर बच्चों के जन्म पंजीयन नहीं बन पाते हैं। बाल तस्करी के मामलों में बच्चों का पता लगाने में जन्म पंजीयन महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है।

            उन्होंने बताया प्रत्येक वर्ष देश में 44 हजार से अधिक बच्चे गायब होते हैं, जिनमें से लगभग 11 हजार कभी नहीं मिलते हैं। बच्चों को देश के भीतर ही यहाँ से वहाँ नहीं भेजा जा रहा है, बल्कि उन्हें देश की सीमा से बाहर भी भेजा जा रहा है। पिछले कुछ समय में बाल तस्करी और उनकी बिक्री के मामले बढ़े हैं। बच्चों को जबरन भीख माँगने के धंधे में उतारा जा रहा है। उनका लैंगिक शोषण किया जा रहा है। बाल मजदूरी कराई जा रही है। प्रशांत दुबे ने बताया कि बच्चों की सुरक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है। हमें विचार करना होगा कि अपने स्तर पर हम क्या कर सकते हैं? पत्रकार और लेखकों को इन विषयों को गंभीरता से उठाना चाहिए। इस अवसर पर जनसंचार एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।