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रचनात्मकता एवं कल्पनाशीलता की ताकत को जगाइये – श्री उपासने

10 से 5 का काम नहीं पत्रकारिता और विज्ञापन – श्री नायडू

विज्ञापन रचनात्मक उद्योग है - श्री शुक्ला

एमसीयू में दो दिवसीय सेमीनार का हुआ शुभारंभ

झारखंड चिल्ड्रन फिल्म फेस्टिवल के विजेता विद्यार्थियों का हुआ सम्मान

भोपाल, 26 नवंबर, 2018: आजकल दुनिया विज्ञापनों के द्वारा ही चल रही है और विज्ञापन ही दुनिया हो गई है, इसलिए रचनात्मकता एवं कल्पनाशीलता की ताकत को अपने अंदर जगाइये। ये विचार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित विभागीय संगोष्ठी के प्रथम दिन शुभारंभ सत्र में विवि. के कुलपति श्री जगदीश उपासने ने व्यक्त किए । विज्ञापन, जनसंपर्क एवं फिल्म वालों का काम रोज कुछ-न-कुछ नया करने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि रचनात्मकता की कोई सीमा नहीं है । श्री उपासने ने कहा कि विज्ञापन का लक्ष्य ग्राहक को अपनी ओर आकर्षित करना है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा, जब वक्ता बोलता है तो उसका नॉलेज बोलता है, इसलिए सेमीनार में हर वक्ता को ध्यान से सुनना चाहिए। शुभारंभ सत्र में झारखंड चिल्ड्रन फिल्म फेस्टिवल में द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले विभाग के विद्यार्थियों को सम्मानित भी किया गया। उल्लेखनीय है कि विभाग के एम.एससी फिल्म प्रोडक्शन के विद्यार्थियों ने लाडो नाम से एक सवा तीन मिनट की शार्ट मूवी का निर्माण किया था। रांची में हुए इस आयोजन में पुरस्कार के रुप में एक प्रतीक चिन्ह एवं 12 हजार का चैक प्रदान किया गया था। इस मौके पर विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो (डॉ.) पवित्र श्रीवास्तव एवं विद्यार्थी भी उपस्थित थे।

सेमीनार में वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सम्पादक श्री चंद्रकांत नायडू ने कहा कि अगर इस पेशे में आना चाहते हैं तो 10 से 5 की मानसिकता से न आएं। उन्होंने कहा कि विज्ञापन में एक अरसा गुजार देने के बाद आपकी नजर भी वैसी ही बन जाती है, लेकिन आपको अपनी क्षमता को जगाने की कोशिश करते रहने चाहिए। श्री नायडू ने कहा कि पहले के विज्ञापन और आज के विज्ञापन में बहुत फर्क आ गया है एवं आजकल सोशल मीडिया के आने के बाद तो विज्ञापन में और भी तेजी से बदलाव हो रहा है। विज्ञापन के नियम-कायदों की बात करते हुए उन्होंने कहा कि बुनियादी बात ये है कि हम कितना नैतिक हैं।

सेमीनार के द्वितीय सत्र में जागरण लेकसिटी युनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मीडिया स्टडीज के चेयरमैन एवं डीन श्री दिवाकर शुक्ला ने विज्ञापन के लिए रचनात्मक रणनीतियों के बारे में विद्यार्थियों से चर्चा की। उन्होंने विज्ञापन की दुनियां के कुछ रचनात्मक वीडियो को दिखाते हुए कहा कि ये कभी खत्म नहीं होती है। छात्रों को हमेशा प्रायोगिक ज्ञान दिये जाने की बात करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञापन को रचनात्मक उद्योग बताया । उन्होंने कहा कि जिस तरह एक बच्चा बार-बार “क्यों” वाला सवाल करता है। वैसे ही रचनात्मकता में भी यह सवाल जरुरी है। विज्ञापन जगत की हस्ती श्री शुक्ला ने कहा कि विज्ञापन एक मंच है, जो प्रोडक्ट को ग्राहक तक पहुंचाता है। विज्ञापन के लिए उद्देश्य होने की बात करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों को खूब पढ़ने की भी नसीहत दी। इसके साथ ही उन्होंने विद्यार्थियो से कहा कि आप चाहे जिस क्षेत्र से आएं हो, लेकिन आपको क्षेत्रीय भाषाओं का ज्ञान होना बहुत जरुरी है। सत्र की अध्यक्षता न्यू मीडिया टेकनोलॉजी की विभागाध्यक्ष प्रो. पी. शशिकला ने की।

तृतीय सत्र में वहीं आईएनडी 24 एमपी.सीजी हेड नवीन पुरोहित ने रचनात्मकता में प्रदर्शन की संभावनाओं पर अपने विचार व्यक्त रखे। उन्होंने कहा ये विश्वविद्यालय एक रनवे की तरह है जिसमें आप जितना अच्छा दौड़ेंगे उतनी ऊंचाइयों पर जाएंगे। गुरु सिर्फ आपको मार्गदर्शन देते हैं लेकिन अभ्यास आपको सफल बनाते हैं। सत्र की अध्यक्षता मीडिया प्रबंधन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ) अविनाश वाजपेयी ने की।

अंतिम सत्र में प्रोडक्शन के लिए रचनात्मक रणनीतियों को कैसे बनाएं, लाइन एवं आर्ट डायरेक्टर अनूप जोशी ने इस बारे में बताया। उन्होंने कहा कि लाइन डायरेक्टर का काम ही ऐसा होता है जिसमें आप ना नहीं कह सकते । इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि ये ऐसा काम है जिसका कोई ग्रामर नहीं है। विद्यार्थियों को जीवन को बड़ी सीख देते हुए उन्होंने कहा कि किसी को हो नहीं सकता मत बोलो, मैं कोशिश करुंगा ये बोलना सीखो, क्योंकि जब आप कोशिश करने की बात कहते हैं तो आधा काम तो हो चुका होता है। श्री जोशी ने कहा कि आप जो भी करते हैं यदि प्लानिंग के साथ करेंगे तो कभी परेशानी नहीं होगी और आपका पैसा और समय दोनों बचेगा। वहीं वरिष्ठ पत्रकार एवं कला समीक्षक विनय उपाध्याय कला, संस्कृति एवं समालोचना पर अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि सिनेमा एक ऐसी तकनीक है जिसके जरिये हमारे जीवन को कलात्मक तरीके से पर्दे पर दिखाया जाता है। सिनेमा को देखते समय आपको हमेशा जिज्ञासू रहना चाहिए। जब भी देखें जिज्ञासू की तरह देखें इसमें आपको आनंद आएगा। श्री उपाध्याय ने कहा कि यदि किसी बड़े कलाकार का आप साक्षात्कार ले रहे हैं तो अहंकार को सबसे पहले जमीन पर रखना पड़ेगा। सांस्कृतिक पत्रकारिता के लिए यह बहुत जरुरी है। जब आप ऐसा करेंगे तो वह बड़ा कलाकार आपको बहुत अच्छा साक्षात्कार देगा और खुशी-खुशी आपको सब बताएगा। सत्र की अध्यक्षता विवि के कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी ने की।