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बनारसीदास चतुर्वेदी ने जनपदीय एवं सरोकारी पत्रकारिता के महत्व को किया स्थापित

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सभागार में पं. बनारसीदास चतुर्वेदी की पुण्यतिथि प्रसंग पर संगोष्ठी का आयोजन

भोपाल, 02 मई, 2018: पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी ने जीवनपर्यंत सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। पत्रकारिता में उन्होंने जो मान्यताएं स्थापित कीं, वे हमारे लिए प्रकाश स्तम्भ हैं। जनपदीय  (स्थानीय) पत्रकारिता का महत्व स्थापित करने का श्रेय बनारसीदास चतुर्वेदी को जाता है। उन्होंने कोलकाता से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय समाचार-पत्र 'विशाल भारत' से त्याग-पत्र देकर टीकमगढ़ जैसे छोटे स्थान से 'मधुकर' समाचार-पत्र का प्रकाशन-संपादन किया। मधुकर के माध्यम से उन्होंने स्थानीय पत्रकारिता और बुंदेली साहित्य को समृद्ध किया। यह विचार वरिष्ठ साहित्यकार गुणसागर सत्यार्थी ने पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी की पुण्यतिथि प्रसंग पर 'पत्रकारिता एवं संस्मरण साहित्य में बनारसीदास चतुर्वेदी का योगदान' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से किया गया।

            श्री सत्यार्थी ने कहा कि आज पत्रकारिता और साहित्य में वैसी सैद्धांतिक प्रतिबद्धतता देखने में नहीं आती है, जो दादा (बनारसीदास चतुर्वेदी) के समय में देखने में आती थी। उनका मानना था कि सीमित क्षेत्र में अधिक ठोस कार्य करने की संभावना रहती है। इसलिए वह कहते थे कि स्थानीय पत्रों को अखिल भारतीय होने की जिद छोड़ देनी चाहिए और अपने अंचल की सेवा के लिए कार्य करना चाहिए। यह छोटे समाचार-पत्रों क लिए भी अच्छा रहेगा और पत्रकारिता एवं समाजहित में भी होगा। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कहा कि श्रमजीवी पत्रकार संघ की स्थापना और श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम का श्रेय बनारसीदास चतुर्वेदी को जाता है। उन्होंने पत्र लेखन विधा को नया आयाम दिया था। उन्होंने अनेक पत्र लिखे जिनमें देश, भाषा, समाज और पत्रकारिता की चिंता एवं समकालीन घटनाक्रमों का विवरण है। इस अवसर पर साहित्यकार गुरुवचन सिंह ने पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी के योगदान पर शोध कार्य करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि स्व. चतुर्वेदी के लेखन में संविधान के प्रति आग्रह झलकता है। उन्होंने बुंदेली भाषा की समृद्धि के लिए वातावरण तैयार किया। कार्यक्रम में उपस्थित बनारसीदास चतुर्वेदी के प्रौत्र डॉ. अपूर्व चतुर्वेदी ने अनेक प्रेरक प्रसंग सुनाए और बताया कि दादा ने प्रवासी भारतीयों के संघर्ष को लेकर लेखन किया। पर्यावरण के प्रति जो चिंता उस समय जताई थी, उसका महत्व आज हमें समझ आता है।

            कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा ने कहा कि पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी एक महत्वपूर्ण पीढ़ी के प्रतिनिधि रहे हैं, जिसने आजादी के पूर्व और आजादी के बाद, दोनों समय में पत्रकारिता की। उन्होंने पत्रकारिता को मिशन से 'मीडिया' बनते देखा है। स्वर्गीय चतुर्वेदी ने पत्रकारों के लिए आदर्श आचार संहिता भी तैयार की थी। इस संबंध में उन्होंने एक सूची बनाई थी, जिसमें बताया गया था कि पत्रकार को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। एक पत्रकार बनने के लिए कौन-से गुण होना चाहिए, यह भी उन्होंने अपनी उस सूची में लिखा है। श्री आहूजा ने कहा कि उनके पत्रों में जो अनछुए पहलू हैं, पत्रकारिता विश्वविद्यालय उन पर भविष्य में शोध कराएगा। कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष डॉ. राखी तिवारी ने किया। आभार ज्ञापन डीन अकादमिक डॉ. पवित्र श्रीवास्तव ने किया। इस अवसर पर संबद्ध अध्ययन संस्थाओं के निदेशक श्री दीपक शर्मा, सभी विभागों के अध्यक्ष, शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

'न भूलेंगे-न बिसरेंगे' का विमोचन :

कार्यक्रम में पुस्तक 'न भूलेंगे-न बिसरेंगे : मध्यप्रदेश की पत्रकारिता के 6 सुनहरे पृष्ठ' का विमोचन किया गया। पुस्तक का संपादन श्री लाजपत आहूजा ने किया। सहयोग वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने किया है। पुस्तक में मध्यप्रदेश के छह यशस्वी पत्रकार- ओपी कुंद्रा, मदन मोहन जोशी, काशीनाथ चतुर्वेदी, जवाहर लाल राठौड़, बनवारी लाल बजाज और सूर्यनारायण शर्मा के संबंध में विस्तृत आलेख शामिल हैं। पुस्तक के संबंध में श्री आहूजा ने बताया कि पिछले कुछ समय में प्रदेश के कुछ ऐसे नामचीन पत्रकारों का देहावसान हुआ है, जिनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। ये सभी मानो एक प्रकार से अपने आप में 'चलित संस्था' थे। पुस्तक में शामिल पत्रकार युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। पुस्तक का प्रकाशन माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय ने किया है।