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समूचा भारतीय समाज प्रकृति पूजक : श्री आंबेकर

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय एवं विद्यार्थी कल्याण न्यास द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय सामाजिक कार्यशाला का आयोजन, समापन आज

भोपाल, 11 जुलाई, 2018: सामाजिक कार्यकर्ता श्री सुनील आंबेकर ने कहा कि कुछ लोग भारतीय समाज के एक हिस्से को प्रकृति पूजक कह कर उसे शेष समाज से काटने का प्रयास करते हैं। उनके द्वारा विभेद खड़ा करने का प्रयास किया जाता है। किंतु, सत्य यह है कि समूचा भारतीय समाज ही प्रकृति पूजक है। हम सब तुलसी, वट वृक्ष, नर्मदा-गंगा, पहाड़, नाग और अन्य जीव-जन्तुओं की पूजा करते हैं। यह प्रकृति पूजा ही है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और विद्यार्थी कल्याण न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय सामाजिक कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को श्री आंबेकर मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति श्री जगदीश उपासने ने की।

            श्री आंबेकर ने कहा कि प्रचलित राजनीतिक अवधारणाओं के दृष्टिकोण से देखें तो भारत में इतनी जनजातियां, जातियां, भाषाएं और भोगौलिक विशेषताएं हैं कि प्रतीत होता है कि यह बहुत सारे राष्ट्र हैं। किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। संकीर्ण सुविधाओं के आधार पर यह देश बना है, ऐसा नहीं है। हमारे देश में आपसी मेल-जोल हजारों वर्षों में मजबूत होता गया है। उसके आधार पर हमारा राष्ट्र बना है। उन्होंने कहा कि आज अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के बीच भ्रम फैलाने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। समाज के प्रबुद्ध वर्ग को इस प्रकार के भ्रम को रोकने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने बताया कि देश की वर्तमान वास्तविक परिस्थिति का आकलन करने की आवश्यकता है और जो लोग समाज को बाँटने का षड्यंत्र कर रहे हैं, उनकी मंशा को समझना आवश्यक है।

सर्चिंग और शेयरिंग का जमाना : अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति श्री जगदीश उपासने ने कहा कि यूरोप से संचालित एक विचार समूह यह मानता है कि सांस्कृतिक सत्ता देश की उप-संस्कृतियों का दमन करती है। उन्होंने कहा कि यूरोप के देशों में यह अवधारणा सत्य हो सकती है, किंतु भारत में ऐसा नहीं है। क्योंकि भारत में उप-संस्कृति जैसा कुछ नहीं है। यहाँ आसेतु हिमालय एक ही संस्कृति है। श्री उपासने ने कहा कि सर्चिंग और शेयरिंग का जमाना है। जितना अधिक सर्च करेंगे और उसे शेयर करेंगे, उतना अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि यूरोप के राष्ट्र कृत्रिम रूप से बने हैं और बिगड़े हैं, जबकि भारत स्वाभाविक तौर पर एक राष्ट्र है। उप-संस्कृतियों के बहाने वहाँ छोटी-छोटी अस्मिताओं को खड़ा करके विवाद खड़े किए जाते हैं। भारत में आज जितने प्रकार के संघर्ष दिखाई दे रहे हैं, उसके पीछे हमारे ऐसे ही तथाकथित बुद्धिजीवी हैं, जो यूरोप से अपना विचार बनाते हैं। इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत एवं परिचय न्यास के सचिव डॉ. उमेश शर्मा ने दिया। पं. सुंदरलाल शर्मा केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान के सभागार में आयोजित कार्यशाला में राजीव गाँधी प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सुनील कुमार गुप्ता, अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज, प्रदेश फीस समिति के अध्यक्ष प्रो. टीआर थापक, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी और ऑर्गेनाइजर पत्रिका के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर सहित गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। देश की वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर चिंतन एवं समाधान के उद्देश्य से विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले प्रतिनिधि, प्राध्यापक एवं शोधार्थी सम्मिलित हुए।