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राजेन्द्र माथुर ने दी हिंदी पत्रकारिता को प्रतिष्ठा

स्वतंत्रता के बाद आदर्श पत्रकारिता के प्रतिमान हैं राजेन्द्र माथुर

मूल्यों और सिद्धांतों की पत्रकारिता में आड़े नहीं आता कोई दबाव

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में राजेन्द्र माथुर जयंती प्रसंग पर विशेष व्याख्यान का आयोजन

भोपाल, 07 अगस्त, 2018: हिंदी पत्रकारिता के यशस्वी संपादक रहे हैं, राजेन्द्र माथुर। उन्होंने प्रादेशिक स्तर पर सीमित हिंदी पत्रकारिता को राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वह भाषा की शुद्धता के प्रति बहुत आग्रही थे। जब वह संपादक थे, तब उन्होंने समाचार-पत्र की भाषा में एकरूपता और शुद्धता के लिए 'स्टाइल शीट' (शैली पुस्तिका) बनवाई थी। वह अपने सहयोगी पत्रकारों को सदैव अध्ययन के लिए प्रोत्साहित करते थे। यह विचार वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेश बादल ने राजेन्द्र माथुर के जयंती प्रसंग पर आयोजित विशेष व्याख्यान में व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति श्री जगदीश उपासने ने की।

            इस अवसर पर मुख्य वक्ता श्री बादल ने हिंदी पत्रकारिता के आदर्श राजेन्द्र माथुर के साथ बिताए अपने अनुभवों को पत्रकारिता के विद्यार्थियों से साझा किया। उन्होंने बताया कि वह बड़े समाचार-पत्रों के संपादक होकर भी बहुत सरल और सहज थे। सदैव अपने सहयोगी पत्रकारों की मदद करते थे। उन्होंने पत्रकारिता के विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें पत्रकारिता को समझने के लिए राजेन्द्र माथुर को पढऩा चाहिए। उनका लिखा हुआ आज भी प्रासंगिक है। वह ऐसे संपादक हैं, जिन्होंने समाचार-पत्र में आम बोल-चाल की हिंदी को बढ़ावा दिया। उन्होंने बताया कि माथुरजी इंदौर के एक महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे, किन्तु अपनी भाषा हिंदी को लेकर वह बहुत सजग एवं आग्रही थे।

            कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति श्री जगदीश उपासने ने कहा कि राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी को महान पत्रकार राहुल बारपुते ने गढ़ा था, जो स्वयं में 'पत्रकारिता की पाठशाला' थे। दोनों एक ही शहर से निकले थे। दोनों ने हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाया। दोनों पत्रकारिता के दो शिखरों पर बैठे संपादक थे। उन्होंने बताया कि जिनका लिखा हुआ पढऩे के लिए पूरा देश आतुरता से प्रतीक्षा करता था, ऐसे संपादक राजेन्द्र माथुर का व्यवहार बहुत ही सहज था। कार्यक्रम के प्रारंभ में राजेन्द्र माथुर के व्यक्तित्व पर राज्यसभा टीवी द्वारा बनाए गए वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया। अंत में आभार प्रदर्शन विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव श्री लाजपत आहूजा ने किया। श्री आहूजा ने कहा कि राहुल बारपुते की पाठशाला से निकले महान संपादक राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी को पढ़ा जाना इसलिए भी आवश्यक है, ताकि हम स्वतंत्रता के बाद की आदर्श पत्रकारिता को जान सकें। इस अवसर पर कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष डॉ. राखी तिवारी ने किया।

आपातकाल की आलोचना में रिक्त छोड़ दिया संपादकीय : वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेश बादल ने बताया कि माथुर जी सरोकारी पत्रकारिता करते थे। वह कभी किसी दबाव में झुके नहीं। आपातकाल के समय में एक-एक समाचार कलेक्टर की अनुमति प्राप्त होने के बाद छपने जाता था। ऐसी परिस्थितियों में आपातकाल की आलोचना करने के लिए राजेन्द्र माथुर ने संपादकीय रिक्त छोडऩे का साहसिक निर्णय लिया।

पत्रकारिता के अध्ययन के लिए विश्वविद्यालय की आवश्यकता को बताया : श्री बादल ने कहा कि माथुर जी वह पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने 1986 में सबसे पहले पत्रकारिता के विश्वविद्यालय की आवश्यकता बताई थी। उसके बाद ही माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की नींव पड़ी। बाजार का जो रूप उस समय उनके सामने आ रहा था, उसको लेकर वह थोड़े चिंतित थे। उनका मानना था कि आने वाली पीढ़ी बाजार के दबाव का सामना नहीं कर पाएगी। इसलिए वह पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली पीढ़ी के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए विश्वविद्यालय की आवश्यकता को बताते थे। उन्होंने बताया कि माथुर जी कहते थे कि मूल्यों और सिद्धांत की पत्रकारिता करते समय कभी-भी किसी प्रकार का दबाव आड़े नहीं आता है।

'पत्र संपादक के नाम' से तैयार हुए अनेक पत्रकार : श्री बादल ने बताया कि माथुर जी 'पत्र संपादक के नाम' स्तम्भ को बहुत पसंद करते थे। उस स्तम्भ में आने वाले पत्रों को वह स्वयं संपादित करते थे। श्री बादल ने बताया कि इस स्तम्भ के माध्यम से उन्होंने अनेक पत्रकार तैयार किए और अनेक लोगों की हिंदी सुधारी।